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लघु कथाएँ : |
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लघु कथाओं का यह संग्रह अनमोल है| यह पूर्णत: निशुल्क एवं अव्यवसायिक है| ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहूंचाने का मकसद लिए हुए, हमारा सिर्फ़ एक ही उद्येश्य है कि अपने पाठकों को ऐसी पठन सामग्री उपलब्ध कराई जाए, जिसे पढ़कर अपने समाज का आईना दिखे एवं किसी न किसी तरह की सीख और प्रोत्साहन मिले| जिन लेखकों की रचनाएँ यहाँ प्रकाशित हैं, उनका कार्य सराहनीय एवं उल्लेखनीय है| हम तहेदिल से उनका तथा स्त्रोतों का साभार व्यक्त करतें हैं|
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विकलांग |
-अशोक अंजुम
- साभार : संडे जागरण |
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बहुत देर से बस में वे अगली सीट पर बैठे दो संभ्रान्त व्यक्तियों का उपहास कर रहे थे; दरअसल वे दोनों संभ्रान्त व्यक्ति जिस सीट पर बैठे थे उसके ऊपर विधायक सीट लिखा हुआ था। ये बात पीछे बैठे नवयुवकों ने पकड ली थी और तब से विधायक जी शब्द को उन्होंने समय काटने के साथ-साथ मनोरंजन के लिए अपनी बातों का केंद्र बिन्दु बना लिया था।
जब काफी समय हो गया और उनसे रहा नहीं गया तब आगे बैठे उन संभ्रान्त व्यक्तियों में से एक ने पीछे मुडकर उन नवयुवकों को संबोधित करते हुए बडी सहजता से कहा-
आप लोग इतनी देर से बातें बनाए जा रहे हैं चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे, कम से कम एक बार अपनी सीट के ऊपर भी तो देख लो!
सबकी नजर एक साथ ऊपर उठ गई जहां लिखा था- विकलांग सीट
उन नवयुवकों को एक झटका सा लगा कि जैसे मानसिक रूप से अचानक ही वे विकलांग हो गए हैं।
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दूसरा सच |
- रूप देवगुण
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घर के सदस्य कमरे में बैठे गप–शप मार रहे थे। अचानक पड़ोसी जवान लड़के सुजीत का प्रसंग छिड़ गया।
पिता ने कहा, ‘‘कितना अच्छा है सुजीत! हमारे घर के सारे काम–काज सहर्ष कर देता है।’’
माँ बोली, ‘‘कितना भला है सुजीत! कई बार जेब से पैसे लगा देता है और बहुत कहने पर भी वापस नहीं लेता।’’ मुन्ना भी रह न सका, ‘‘सचमुच सुजीत बहुत ही प्यारा है। मुझे कई बार खिलौने भी ला देता है।’’
बड़ी बेटी, जो पास बैठी चुपचाप सारी बातें सुन रही थी, उठकर कमरे से बाहर चली गई। वह जानती थी कि इन सब कामों के बदले में वह उससे बहुत कुछ प्राप्त करने की कोशिश करता रहता है।
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डाका |
- कमल चोपड़ा
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बारात दरवाजे तक पहुँची ही थी कि लड़के के भाइयों ने आतिशबाजी शुरू कर दी। तीस–तीस रुपए का एक–एक एटम बम्ब......धाय.....धाँय। नशे में धुत्त बारातियों के तेवर देखकर लड़की के पिता ब्रजनाथ जी का पसीना छूट गया और वे हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
उसी गाँव में उसी समय थोड़ी ही दूर सेठ मदन लाल की हवेली पर पहुँचते ही डाकुओं ने दो–चार हवाई फायर किए। सेठ पसीना–पसीना काँपते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गए, ‘‘जो चाहे ले जाओ.... बस हमारी जान बख्श दो।’’ डाकुओंका सरदार चीखा, ‘‘वीरू, चन्दू...राधे.... जल्दी करो, बर्तन-सर्तन जो मिले.... जल्दी करो, गठरियाँ बाँध लो और जल्दी से निकल चलो....’’
गाँव में डाका पड़ने की खबर शादी वाले घर भी पहुँच चुकी थी। बारातियों में भी हड़बड़ी मच गई।
‘‘पंडित जी जल्दी करो.... रघु.... सत्तू... विजय..... जल्दी जल्दी से दहेज का सामान बाँधो.... बर्तन- सर्तन जो कुछ भी है, छिटपुट सभी समेटो.... गठरियों में ही बाँध लो और निकल चलो....’’
उधर डाकू सरदार चीख रहा था, ‘‘सेठ। ! नगदी ,जेवर ,बर्तन अपने आप जल्दी से निकाल दे।’’ और सेठ जी काँपते हुए उनकी आज्ञा का पालन करने लगे।
‘‘बधाई हो ब्रजनाथ जी!...फेरे भी हो गए.... अब जरा जेवर और नगदी भी जल्दी से दीजिए। समय बड़ा खराब है। हमें अँधेरा रहते ही तारों की छाँव में ही निकल पड़ना चाहिए।’’
उधर डाकू सरदार सिंह कह रहा था, ‘‘साथियों ! इससे पहले कि कोई मुसीबत खड़ी हो, हमें सुबह होने से पहले अँधेरे में ही निकल जाना चाहिए......।’’
डाकुओं ने जाते हुए फिर से हवाई फायर किए। उनके जाते ही सेठ जी व उनका लुटा–पिटा परिवार रोने लगा।
डोली चली तो एक बार फिर से बैंड खड़खड़ाने लगा। डोली के जाते ही ब्रजनाथ व उनके घर वाले खाली–खाली घर को देखकर सिसकने लगे। जमा-जोड़ और ‘लक्ष्मी’ सब कुछ चला गया।
थोड़ी ही देर में गाँव में पुलिस आ गई। लेकिन न जाने क्यों पुलिस का एक भी आदमी ब्रजनाथ जी के घर नहीं आया था।
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नरक |
- राजकुमार सिंह
- साभार : संडे जागरण |
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बेटी! मैं सोच रहा हूं कल अपने घर चला जाऊं। तुम्हारे पास रहते हुये कई माह हो गये हैं।
पिताजी! आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। क्या आप भूल गये? भय्या और भाभी ने आपको कितना प्रताडित और अपमानित करके घर से बाहर निकाल दिया था। मैं तो इसे अभी तक नहीं भूल पायी।
मैं कब तक तुम पर बोझ बना रहूंगा? बेटियां बोझ होती हैं, पिता नहीं। बेटी के घर में रहकर पाप लगेगा।
अपने पिता को अपमानित करने का पाप भय्या और भाभी को लगेगा, आपको नहीं। बेटी! क्यों अपने पिता को नरक में ढकेल रही है?
पिताजी! जिस नरक की बात आप कर रहे हैं वह तो मैंने नहीं देखा। पर हां, आप जिस स्थान पर जाने के लिए कह रहे हैं वह नरक जरूर मेरी आंखों के सामने घूम रहा है। मैं जीते जी आपको उस नरक में नहीं ढकेलूंगी बस। |
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औचक निरीक्षण |
- कृष्णकुमार उपाध्याय
- साभार : संडे जागरण |
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विद्यालय में ठीक से पढाई न होने और अध्यापकों द्वारा ट्यूशन-कोचिंग के लिए मजबूर किए जाने की अभिभावकों की शिकायतों से तंग आकर उच्चाधिकारियों ने औचक निरीक्षण की योजना बनायी।
उस दिन विद्यालय में सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। प्रधानाचार्य अपने कक्ष से विद्यालय के अनुशासन का जायजा ले रहे थे, सभी कक्षाएं सुचारुरूप से चल रही थीं, अलबत्ता छात्रों की संख्या अवश्य बहुत कम थी। विद्यालय पहुंचते ही निरीक्षक दल का पूरे उत्साह से स्वागत किया गया। भेंट-पूजा [उपहार आदि] के साथ ही अच्छी पेट पूजा भी करायी गयी। निरीक्षण आख्या में विद्यालय के अनुशासन और शिक्षण की सराहना करते हुए यहां तक लिख दिया गया कि यहां का अनुसरण करके दूसरे विद्यालय भी आदर्श स्थापित करें। अभिभावकों को अब अपनी भूल का अहसास हो रहा था, अब वे भली प्रकार जान चुके थे कि विद्यालय प्रबंधतंत्र की जडें कितनी गहरी और मजबूत हैं। |
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- रमेश बतरा |
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वे हो–हल्ला करते एक पुरानी हवेली में जा पहुँचे। हवेली के हाते में सभी घरों के दरवाजे बंद थे। सिर्फ़ एक कमरे का दरवाजा खुला था। सब दो–दो, तीन–तीन में बँटकर दरवाजे तोड़ने लगे और उनमें से दो जने उस खुले कमरे में घुस गए।
कमरे में एक ट्रांजिस्टर होले–होले बज रहा था और एक आदमी खाट पर सोया हुआ था।
‘‘यह कौन है?’’ एक ने दूसरे से पूछा।
‘‘मालूम नहीं,’’ दूसरा बोला, ‘‘कभी दिखाई नहीं दिया मुहल्ले में।’’
‘‘कोई भी हो,’’ पहला ट्रांजिस्टर समेटता हुआ बोला, ‘‘टीप दो गला!’’
‘‘अबे, कहीं अपनी जाति का न हो?’’
‘‘पूछ लेते हैं इसी से।’’ कहते–कहते उसने उसे जगा दिया।
‘‘कौन हो तुम?’’
वह आँखें मलता नींद में ही बोला, ‘‘तुम कौन हो?’’
‘‘सवाल–जवाब मत करो। जल्दी बताओ वरना मारे जाओगे।’’
‘‘क्यों मारा जाऊँगा?’’
‘‘शहर में दंगा हो गया है।’’
‘‘क्यों.. कैसे?’’
‘‘मस्जिद में सूअर घुस आया।’’
‘‘तो नींद क्यों खराब करते हो भाई ! रात की पाली में कारखाने जाना है।’’ वह करवट लेकर फिर से सोता हुआ बोला, ‘‘यहाँ क्या कर रहे हो?...जाकर सूअर को मारो न !’’
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- शकुन्तला किरण |
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सावित्री ने जब सुहाग-पूजा के लिए रोज की सूती साड़ी ही पहनी तो सत्येन झल्ला पड़ा, ‘‘वहाँ सबके सामने यह साड़ी अच्छी लगेगी? वह लाल चुनरी वाली पहन जाओ न।’’
‘‘हूँ?.....खूब बक्से भरे हैं न साड़ियों से?.....ले-देकर वही तो एक साड़ी है, उसे भी बिगाड़ दूँ, तुम्हें तो लाज-सरम नहीं......पर मुझे तो घर की इज्जत....’’
‘‘एक ही साड़ी? वह मूँगिया चैक वाली? गोटे की नीली जापानी? शादी की गुलाबी वाली?’’
‘‘और....सुना दो, सौ-दो सौ नाम? मैं कब मना कर रही हूँ? तुम तो बाबा हर दिन नई साड़ी लाते हो! हर रोज नया गहना गढ़वाते हो! करम फूटी तो मैं ही हूँ.....जो तुम्हारे पल्ले पड़ गई हूँ! तुम तो औरत का इत्ता खयाल रखते हो कि बस्स.....!!’’
‘‘सारी बात सिर्फ बदलने की थी.....उसमें कितनी बकबक......?’’
‘‘पागल कुत्ती हूँ न? तभी तो इतनी बकबक करती हूँ! पर तुम तो कवि नहीं, एक अफसर हो अफसर ! पाँच-सात हजार महीना कमाते हो, और आँख मूँद......सीधे मेरी हथेली पर धर देते हो? हुँह!....अगर दो दिन भी घर चलाना पड़े तो सारा कविपणा ठिकाणे आ जाए! भाग तो मेरे ही फूटणे थे जो तुम्हारे पल्ले....’’
और उसका सुबकना चालू हो गया।
‘‘अच्छा बाबा, माने लेता हूँ कि तुम्हारे पास एक भी साड़ी नहीं है...यहाँ तक कि यह जो पहन रखी है....वह भी नहीं। अब जाओ....नीचे औरतें आवाजें दे रही हैं!.....पर.....यह बता जाओ कि खाना कहाँ पर रखा है?’’
‘‘चूल्हे में।’’
और सावित्री आँसू पोंछती, उसी साड़ी में, चिरसुहाग का वर देने वाले ईसर-गणगौर के व्रत-पूजन को चल दी।
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- युगल
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गरीब बन्ने का बारह साल का लड़का पेट–दर्द से परेशान था और शरीर से बहुत कमजोर होता गया था। टोना–टोटका और घरेलू इलाज के बावजूद हालत बिगड़ती गई थी। दर्द उठता तो लड़का चीखना, और मां–बाप की आंखों में आंसू आ जाते। एक रात जब लड़का ज्यादा बदहवास हुआ, तो मां ने बन्ने को बच्चे का पेट दिखलाया। बन्ने को देखा–छोटा कछुए के आकार–सा कुछ पेट के अन्दर से थोड़ा उठा हुआ है और हिल रहा है। गांव के डॉक्टर ने भी हैरत से देखा और सलाह दी कि लड़के को शहर को अस्पताल में ले जाओ।
बन्ने पत्नी के जेवर बेच लड़के को शहर ले आया। अस्पताल के सर्जन को भी अचरज हुआ–पेट में कछुआ! सर्जन ने जब पेट को ऊपर से दबाया तो कछुए–जैसी वह चीज इधर–उधर होने लगी और लड़के के पेट का दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया। सर्जन ने बतलाया–‘‘लड़के को बचाना है, तो प्राइवेट से आपरेशन के लिए दो हजार रुपए का इन्तजाम करो।’’
दो हजार! बन्ने की आंखें चौंधियां गई। दो क्षण सांस ऊपर ही अटकी रह गई। न! लड़के को वह कभी नहीं बचा सकेगा। उसे जिस्म की ताकत चुकती लगी। वह बेटे को लेकर अस्पताल के बाहर आ गया और सड़क के किनारे बैठ गया।
लड़के को कराहता देखकर किसी ने सहानुभूति से पूछा–‘‘क्या हुआ है?’’
बन्ने बोला–‘‘पेट में कछुआ है साहब!’’
‘‘पेट में कछुआ?’’ मुसाफिर को अचरज हुआ।
‘‘हां साहब! कई महीनों से है।’’ और बन्ने ने लड़के का पेट दिखलाया। पेट पर उंगलियों का टहोका दिया, तो वह कछुए–जैसी चीज ज़रा हिली। बन्ने का गला भर गया–‘‘आपरेशन होगा साहब! डॉक्टर दो हजार मांगता है। मैं गरीब आदमी....’’ और वह रो पड़ा।
तब कई लोग वहां खड़े हो गए थे। उस मुसाफिर ने दो रूपए के नोट निकाले और कहा–‘‘चन्दा से इकट्ठा कर लो और लड़के का आपरेशन करा लो।’’
फिर कई लोगों ने एक–एक दो–दो रुपए और दिए। जो सुनता टिक जाता–पेट में कछुआ?...हां जी चलता है...चलाओ तो!
बन्ने लड़के के पेट पर उंगलियों से ठोकर देता। कछुआ हिलता। लड़के के पेट का दर्द आंखों में उभर आता। लोग एक, दो या पांच के नोट उसकी ओर फेंकते–‘‘आपरेशन करा लो भाई। शायद लड़का बच जाए!’’
सांझ तक बन्ने के अधकुर्ते की जेब में नोट और आंखों में आशा की चमक भर गई थी।
अगले दिन बन्ने उस बड़े शहर के दूसरे छोर पर चला गया। वह लड़के के पेट पर टकोरा मारता। पेट के अन्दर का कछुआ ज़रा हिलता। लोग प्रकृति के इस मखौल पर चमत्कृत हाते और रुपए देते। बन्ने दस दिनों तक उस शहर के इस नुक्कड़ से उस नुक्कड़ पर पेट के कछुए का तमाशा दिखलाता रहा और लोग रुपए देते रहे। बीच में लड़के की मां बेटे को देखने आती। बन्ने उसे रुपए थमा देता।
लड़के ने पूछा–‘‘बाबू, आपरेशन कब होगा?’’
बन्ने बोला–‘‘हम लोग दूसरे शहर में जाकर रुपए इकट्ठे करेंगे।’’ फिर कुछ सोचता हुआ बोला–‘‘मुन्ने, तेरा क्या खयाल है कि पेट चीरा जाकर भी तू बच जाएगा? डॉक्टर भगवान तो नहीं। थोड़ा दर्द ही होता है न? बर्दाश्त करता चल। यों जिन्दा तो है। मरने से कित्ती देर लगती है? असल तो जीना है।’
लड़का कराहने लगा। उसके पेट का कछुआ चलने लगा था।
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- संगीता स्वरूप
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मैं कक्षा में प्रथम आई हूँ , माँ ! बिटिया खुशी से चिल्लाती घर में घुसी । माँ ने कहा -" अव्वल आई है तो क्या? पराये घर जा कर चूल्हा ही तो झोंकना है तुझे , इतना चिल्ला क्यों रही है ? " माँ की बात बेटी के दिल को लग गई । उसने ठान लिया कि वो चूल्हा तो नही झोंकेगी । वक्त गुज़रा । आज वो भारतीय प्रशासनिक सेवा में है । माँ गर्व से बताती है कि मेरी बेटी सरकारी अफसर है। एक दिन पडोसिन ने पूछ लिया कि - "बेटी को घर का काम भी आता है ? खाना बना लेती है ? " माँ ने अकड़ कर कहा -"मेरी बेटी बहुत बड़ी सरकारी अफसर है , वो चूल्हा क्यों झोंकेगी ? "
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- सतीश दुबे
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बैसाख की सन्नाटे–भरी दोपहरी में कभी एड़ी तो थोड़ी देर बाद पंजे ऊँचे करके चलते हुए वे दुकान के अहाते में पसरी हुई छाइली के बीच खड़े हो गए। क्षण–भर बाद थकान और पीड़ा से भरी हुई निगाह उन्होंने दुकानदार की ओर घुमाई, ‘‘भइया! ये दवाई दे दो। देख लेना जरा, पेट–दरद की ही है ना, बूढ़ी दरद से तड़फ रही है।’’
लाठी टेकते हुए धीमी–धीमी चाल से आ रही इस आकृति के क्रियाकलाप को बड़ी देर से देख रहा दुकानदार अपने को संयत नहीं कर पाया तथा आर्द्रभाव से बोला, ‘‘बाबा! यह क्या? पैरों में जूते–चप्पल तो डाल लिए होते। ऐसी तेज घूप में नंगे पैर, जूते कहाँ गए आपके?’’
‘‘जूते.....’’ उन्होंने धीरे–धीरे अपनी गर्दन ऊँची करके दुकानदार की ओर देखा तथा पूरा वजन लाठी पर टिकाते हुए बोले, ‘‘बबुआ, जब से बेटे के पाँव मेरे पाँव के बराबर हुए हैं, जूते वह पहनने लगा है।’’
उनका जवाब सुनकर दुकानदार को एहसास हुआ, मानो गरम लपट का कोई झोंका आहत करके गुजर गया हो। उसकी निगाह उनके तपे हुए चेहरे, जले हुए पाँवों तक फिसली तथा वह सिहर उठा। उसने दवाई चुपचाप उनकी ओर खिसका दी तथा अपने जूतों को पैरों में जोरों से भींच लिया।
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जगमगाहट |
- रूप देवगुण
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वह दो बार नौकरी छोड़ चुकी थी। कारण एक ही था–बॉस की वासनात्मक दृष्टि, किन्तु उसका नौकरी करना उसकी मजबूरी थी। घर की आर्थिक दशा शोचनीय थी। आखिर उसने एक अन्य दफ्तर में नौकरी कर ली।
पहले दिन ही उसे उसके बॉस ने अपने कैबिन में काफी देर तक बिठाए रखा और इधर–उधर की बातें करता रहा। अबकी बार उसने सोच लिया था, वह नौकरी नहीं छोड़ेगी; वह मुकाबला करेगी। कुछ दिन दफ्तर में सब ठीक–ठाक चलता रहा, किन्तु एक दिन उसके बॉस ने उसे अपने साथ अकेले में उस कमरे में आने के लिए कहा, जहाँ पुरानी फाइलें पड़ी थीं। उन्हें उन फाइलों की चैकिंग करनी थी। उसे साफ लगा रहा था कि आज उसके कुछ गड़बड़ होगी। उस दिन बॉस भी सज–धजकर आया था।
एक बार तो उसके मन में आया कि कह दे कि मैं नहीं जा सकती, किन्तु नौकरी का खयाल रखते हुए वह इन्कार न कर सकी। कुछ देर में ही वह तीन कमरे पार करके चौथे कमरे में थी। वह और बॉस फाइलों की चैकिंग करने लगे। उसे लगा जैसे उसका बॉस फाइलों की आड़ में केवल उसे ही घूरे जा रहा है। उसने सोच लिया था कि ज्यों ही वह उसे छुएगा, वह शोर मचा देगी। दस–पन्द्रह मिनट हो गए, लेकिन बॉस की ओर से ऐसी कोई हरकत न हुई।
अचानक बिजली गुल हो गई। वह बॉस की ही साजिश हो सकती है, यह सोचते ही वह काँपने लगी। लेकिन तभी उसने सुना, बॉस हँसते–हँसते कह रहा था, ‘‘देखो, तुम्हें अँधेरा अच्छा नहीं लगता होगा। तुम्हारी भाभी (बॉस की पत्नी) को भी अच्छा नहीं लगता। जाओ, तुम बाहर चली जाओ।’’ इस अप्रत्याशित बात को सुनकर वह हैरान हो गई। बॉस की पत्नी, मेरी भाभी, यानी मैं बॉस की बहन।
सहसा उसे लगा, जैसे कमरे में हजार–हजार पावर के कई बल्ब जगमगा उठे हैं।
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चुभती बात |
- जयेन्द्र कुमार वर्मा
- साभार : संडे जागरण |
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जूही, अमन आया है क्या? एक सवाल पूछना था उससे।
यहां तो नहीं आया। मैंने तो उसे एक सप्ताह से कालेज में भी नहीं देखा।
पर तेरे घर शाम को तो वह अक्सर आता था। गणित के सवाल तू उसी से तो समझती थी?
हां, पर अब वो नहीं आता। शायद एक महीना हो रहा है। हां, याद आया.. रक्षाबंधन के एक दिन पहले वो आया था।
अब क्यों नहीं आता? झगडा कर डाला क्या उससे?
मैं क्यों झगडूंगी उससे?
तू झगडालू जो है।
सहेली मुस्कराकर बोली- हर बात में सबसे उलझती ही तो रहती है।
अच्छा, तू बडी शरीफ है।
जूही हंसी। फिर कुछ सोचकर बोली- अमन से मैं कभी नहीं झगडी। अपने सीनियर से कैसा झगडा यार? झगडा तो बराबर वालों में होता है। जैसे तेरा और मेरा।
कोई चुभती बात ही कह दी होगी।
उस दिन तो हमारे बीच कोई खास बात ही नहीं हुई थी। सहसा जूही याद करके बोली- मैंने एक सवाल पूछा था और फिर सिर्फ इतना कहा था कि कल रक्षाबंधन है भैया, जरूर आना। |
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आउटगोइंग |
- शेफाली पाण्डेय
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सुदूर पहाड़ में रहकर खेतीबाड़ी करने वाले अपने अनपढ़ एवं वृद्ध माता पिता के हाथ में शहर जाकर बस गए लड़कों ने परमानेंट इन्कमिंग फ्री वाला मोबाइल फ़ोन पकड़ा दिया. साथ ही फ़ोन रिसीव करना व काटना भी अच्छी तरह से समझा दिया. बेटे चिंता से अब पूर्णतः मुक्त.
रविवार –
बड़ा लड़का "इजा प्रणाम, कैसी हो?"
इजा की आंखों में आंसू, 'कितना ख्याल है बड़के को हमारा, हर रविवार को नियम से फ़ोन करता है'.
"ठीक हूँ बेटा, तू कैसा है?'
"मैं ठीक हूँ, बाबू कहाँ हैं?"
"ले बाबू से बात कर ले, तुझे बहुत याद करते हैं".
"प्रणाम बाबू, कैसे हो?"
"जीते रहो".
"बाबू तबियत कैसी है?"
"सब ठीक चल रहा है ना? खेत ठीक हैं? सुना है इस साल फसल बहुत अच्छी हुई है. ऑफिस के चपरासी को भेज रहा हूँ, गेंहूँ, दाल, आलू और प्याज भिजवा देना. यहाँ एक तो महंगाई बहुत है दूसरे शुद्धता नहीं है. जरा इजा को फ़ोन देना.”
"इजा, तेरी तबियत कैसी है?"
"बेटा, मेरा क्या है? तेरे बाबू की तबियत ठीक नहीं है तू...........". "बाबू इतनी लापरवाही क्यों करते हैं? ठीक से ओढ़ते नहीं होंगे. नहाते भी ठंडे पानी से ही होंगे. बुढापे में भी अपनी जिद थोड़े ही छोडेंगे. इजा, तू उनको तुलसी-अदरक की चाय पिलाती रहना, ठीक हो जायेंगे".
"पर मेरी.......".
"अच्छा इजा, अब फ़ोन रखता हूँ, अपना ख्याल रखना. फ़ोन में पैसे बहुत कम बचे हैं" कहकर बेटे ने फ़ोन काट दिया.
"अरे, असल बात तो मैं कहना ही भूल गई कि अब हम दोनों यहाँ अकेले नहीं रहना चाहते. आकर, हमें अपने साथ ले जाये. कैसी पागल हूँ मैं, सठिया गई हूँ शायद", माँ ने पिता कि ओर देख कर कहा तभी फ़ोन कि घंटी दुबारा बजी, 'शायद छोटू का होगा', दोनों की आंखों में चमक आ गई. "हेलो इजा, मैं छोटू, अभी-अभी दद्दा के घर आया हूँ. तू जब दद्दा के लिए सामान भेजेगी, मेरे लिए भी भिजवा देना. हमारी भी इच्छा है कि गाँव का शुद्ध अनाज खाने को मिले", कहकर छोटू ने फ़ोन काट दिया.
माँ ने जब उसका नम्बर मिलाया तो आवाज़ आई, 'इस नम्बर पर आउटगोइंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है'.
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खेल |
- कमल चोपड़ा
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एक फटे हुए कपड़े के बीच में गाँठ मारकर बनाई गई गुडि़या,एक डिबिया और कुछ टूटी–फूटी चूडि़यों के टुकड़े, अपने इन खिलौनों के साथ वीनू खोली के कोने में अकेला ही खेल रहा था।खोली के दरवाजे को ठेलकर अंदर आए पैंट–कमीज वाले बाबू को देखकर वीनू डर गया। उसने भागकर अपनी माँ से हँस–हँसकर बातें करता देख वह कुछ आश्वस्त हुआ।
‘‘वीनू....तू लच्छी के घर जाकर उससे खेल....’’
लच्छी की याद आते ही वीनू अपने खिलौने समेटकर उसके घर खेलने चल दिया।
वापस आया तो दरवाजा बंद था। वह काफी देर खटखटाता रहा। दरवाजा खुला। बाबू उसकी माँ को कुछ रुपए देकर जाने लगा। जाते–जाते एक चवन्नी वीनू के हाथ पर रखता गया।
‘‘माँ! बाबू ने मुझे भी....बाबूजी अच्छे थे ना....पर माँ, ये बाबूजी थे कौन? बताओ ना माँ, कौन थे?’’
‘‘तेरे स्वर्गीय पिता के पुराने दोस्त।’’ माँ ने बहाना टिका दिया।
‘‘अच्छा...पर क्या करने आए थे?....माँ, बोलो ना, क्या करने आए थे?’’
माँ झुँझला उठी,’’ मुझे नहीं पता, सिर मत खा!’’
‘‘माँ....पर मुझे पता है , किसलिए आए थे।’’
‘‘किसलिए ?’’ काँप गई माँ।
‘‘तुम्हारे साथ खेलने....है न माँ....जिस तरह मैं लच्छी के घर जाता हूँ...खेलने के लिए।’’ माँ ने सीने से लगा लिया वीनू को।
‘‘पर माँ....मैंने तो लच्छी को कभी नया पैसा भी नहीं दिया। बाबू तो तुम्हें...माँ...माँ! मै यह पच्चीस पैसे लच्छी को दे आऊँ?’’
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अपना घर |
- जयेन्द्र कुमार वर्मा
- साभार : संडे जागरण |
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इस क्षमा को अचानक क्या हो गया.. चेहरे पर उदासी क्यों? थोडी देर पहले तो बडी खुश थी अपने नये घर में आकर। सात वर्षीया बेटी को उदास देखकर मि. शर्मा पत्नी से बोले- पूछो तो जरा..।
अपने पुराने पडोसी दोस्तों को याद करके दु:खी हो रही है शायद। मिसेज शर्मा मुस्कराई। यहां भी कुछ दिनों में नये दोस्त बन जायेंगे। बन्टी ने तो आज ही दो दोस्त बना लिये। देखो- लॉन में कैसे उछल-कूद रहा है उनके साथ। इसे भी लॉन में भेज दो।
मिसेज शर्मा ने बेटी को पुकार कर कहा- अकेली क्यों बैठी हो बेटी बाहर बन्टी भइया के साथ खेलो न। बेटी बाहर न गयी। गुमसुम-सी पास आकर बोली- एक बात पूछूं मम्मी?
हां-हां, पूछो बेटी। यह घर किसका है? अपना है बेटी.. अपना नया घर।
मेरा भी? हां, हम सब का घर। मि. शर्मा सहर्ष बीच में बोल पडे।
बेटी कुछ पल उनका मुख ताकती रही। फिर पूछा- तो फिर पापा, गेट पर लगे पत्थर में मेरा नाम क्यों नहीं? बेटी के इस प्रश्न का जवाब किसी के पास न था। मि. शर्मा की आंखों में गेट पर लगा पत्थर नाच उठा।
काले चमचमाते पत्थर पर सबसे ऊपर उनका स्वयं का नाम अंकित था, फिर पत्नी का और अन्त में बेटे बन्टी का।
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निकम्मा |
- डा. गोपाल बाबू शर्मा
- साभार : संडे जागरण |
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बात छोटी सी ही थी, बढते-बढते बढ गई। अराजक तत्वों को मौका मिल गया। दंगा भडक उठा। पथराव हुआ। जगह-जगह आग लगी। पुलिस को गोली चलानी पडी। दंगे के दौरान जो लोग मरे, सरकार की ओर से उन्हें साढे सात-सात लाख रुपए मुआवजे के रूप में मिले।
मरने वालों में राजू नाम का वह युवक भी था, जिसे घर के लोग आवारा और निकम्मा कहकर अक्सर ताने मारा करते थे। पर अब वह उनके लिए निकम्मा न था।
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समझ का फेर |
- संगीता स्वरूप |
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कब तक वो इस छोटे से कमरे में अकेली बैठे ? देखूं बाहर क्या हो रहा है, यही सोच कर वो रसोई में पहुँची| अचानक उसके हाथ से काँच का गिलास गिर कर टूट गया| बहू कि कर्कश आवाज़ आई - क्या हुआ ? वो सहमी सी खड़ी थी यही सोचती हुई कि पहले बहू आएगी फिर बेटा| यही हुआ| बहू आग्नेय नेत्रों से देख रही थी| बेटा झुंझला के बोला - "माँ ! तुमको कितनी बार कहा है कि अपने कमरे में रहा करो| कुछ ना कुछ तोड़ - फोड़ करती रहती हो, ये नही कि आराम से कमरे में बैठो| पर तुमको कुछ समझ आए तब ना|" बचपन में ना जाने क्या क्या तोड़ दिया करता था| जब ये बोलना भी नही सीखा था तब इसकी बात मैं इशारे से समझ जाती थी, आज कह रहा है कि मैं इसकी बात समझती नही| यह सोचते सोचते उसके कदम अपने कमरे की ओर बढ़ गये |
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भविष्य निर्माता |
- जयेन्द्र कुमार वर्मा
- साभार : संडे जागरण |
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देखो.. तुम्हारे कालेज के सर जा रहे हैं।
जाने दो..।
नमस्ते तो कर लो।
नमस्ते! हुंह्!.. पता है- इन्हीं की वजह से मैं पिछले साल फेल हुआ था अंग्रेजी में। मेरे कमरे में इनकी ड्यूटी लग गयी थी। पूरी नकल सामग्री छुडा ली थी मेरी। इतने स्ट्रिक्ट हैं कि कोई छात्र सिर तक नहीं हिला सकता।
हर साल जाने कितने छात्रों का भविष्य खराब हो रहा है इनकी वजह से। ऐसे सर से कौन नमस्ते करेगा! लेकिन मैंने तो सुना है कि ये बहुत अच्छा पढाते हैं। इनकी कक्षा में पढने के लिए अधिकांश छात्र अपना सेक्सन बदलवाने के लिए प्रधानाचार्य पर दबाव डलवाते हैं।
हां, ये तो सही है। लेकिन सिर्फ अच्छा पढाने से क्या होता है। छात्रों के भविष्य का भी तो ध्यान रखना चाहिए न।
कुछ दूर और चलने पर-
वो देखो.. पान की दुकान पर.. ये भी तो तुम्हारे कालेज के सर हैं न?
हां, ये तो मेरे कालेज के सबसे अच्छे सर हैं। पता है- इन्हीं की वजह से मैं इस साल फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ हूं। इन्होंने खूब नकल करवाई थी मुझे।
जिस कमरे में इनकी ड्यूटी लग जाती है, छात्र खुशी से झूम उठते हैं। इन्हें छात्रों के भविष्य का बहुत ध्यान रहता है। छ:, सात और आठ के छात्रों को तो ये सादी कापी में भी नम्बर दे देते हैं। अच्छे नम्बर चाहिए तो दो-चार सौ रुपये खर्च कर दीजिये। सभी छात्र इनका बहुत सम्मान करते हैं। वह अति हर्ष से बोला और सडक के उस पार पान की दुकान पर जाकर सर के पैर छूने लगा।
सडक के इस पार से मैं छात्रों के भविष्य निर्माता को अपलक निहारता रहा।
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धनिक का निमंत्रण |
- झेन कथा
- साभार : पत्रिका, हमलोग |
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एक धनिक ने झेन-गुरु इक्क्यू को भोजन पर आमंत्रित किया| इक्क्यू अपने भिक्षुक वस्त्रों में उसके घर गये, पर धनिक उन्हें पहचान न सका और उनको भगा दिया| इक्क्यू वापस अपने निवास पर आए और इस बार एक सुंदर और महँगा चोगा पहन कर धनिक के घर गये| धनिक ने उनको बड़े आदर-भाव से भीतर लिवाया और भोजन के लिए बैठने को कहा| इक्क्यू ने भोजन करने के लिए बिछे आसन पर अपना चोगा उतार कर रख दिया और धनिक से बोले, "चूँकि आपने मेरे चोगे को खाने पर बुलाया है, अतः इसे पहले भोजन कराईए| धनिक को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने इक्क्यू से माफी माँगी|
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सोच |
- डा. गंगप्रसाद पांडेय 'बाबू', उन्नाव
- साभार : संडे जागरण |
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उस दिन जगदीश चच्चू अचानक घर पर आ गये| मेरी पत्नी का चेहरा तमतमा उठा|
"पता नहीं कैसे हैं? कोई ज़रूरत आ पड़ी होगी, अन्यथा यहाँ कोई क्यों आएगा? अपना गुज़रा होता नहीं है, अब इन गाँववालों का गढ्ढा भरते रहो|"
मैने आँख चुराते हुए दूसरे कमरे में चले जाना ही उचित समझा| चच्चू गुसलखाने में हाथ-पैर धोकर, बिस्तर पर लेट अपनी थकान उतारने लगे| आजकल पैसों की दिक्कत कुछ ज़्यादा ही थी| बड़ी बेटी की दवाइयाँ नहीं आईं थीं| लड़के की फीस दो माह से जमा नहीं हुई थी| चच्चू को भी आज ही आना था|
पूरे परिवार में चुप्पी पसरी हुई थी| तभी चच्चू उठे, भोजन किया बगल की कुर्सी पर मुझे बैठने को कहा|
चच्चू बेफ़िक्र हो कर बोले, "बहुत दिनों से तुमने कोई खोज-खबर नहीं ली, न मोबाइल ही किया| क्या परेशान कुछ ज़्यादा हो? इस समय हमारे पास काम काफ़ी है| शाम की गाड़ी से वापस चले जाना है|"
उन्होने कुर्ते की जेब में हाथ डाला और हज़ार-हज़ार के दस नोट निकालकर मेरे हाथ में थमा दिए|
"इस वर्ष काम अच्छा चला है| घर पर कोई कठनाई भी नहीं है|"
मैं कुछ भी कह सकने की स्थिति में नहीं था| मेरी ज़ुबान सूख गई थी| तभी चच्चू ने ज़ोर से प्यार भरी आवाज़ में कहा, "बीरु! तुम लड़के हो, बड़े हो गये हो, रुपये लेने से छोटे थोड़े ही हो जाओगे|"
मैं एकटक उन्हें देखता ही रह गया|
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कच्ची ईंट |
- हाए ताएछूवेन की लघु कथा
- साभार : पत्रिका, हमलोग |
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भट्टी का मजदूर एक-एक कर कच्ची ईंटों को भट्टी में सज़ा रहा था, उनमें से एक ईंट इस डर से काँपने लगी कि वह भट्टी की तेज आग में जल जाएगी|
"डरो नहीं!" दूसरी ईंटों ने उसे समझाया|
"यह सौभाग्य तो मुश्किल से मिलता है| आग ही हमें काम के लायक बनाती है|"
पर उसने एक शब्द भी नहीं सुना और कतराकर बगल में पड़े घास के ढ़ेर में छुप गयी, और इस तरह वह भट्टी में जाने से बच गयी| जब कुछ दिनों बाद पकी ईटों से मिली तो पकी ईटों ने उसके बारे में अफ़सोस जाहिर किया, लेकिन उसे ये देखकर कि उसकी सहेलियों का रंग थोड़ा लाल होने के सिवा ख़ास नहीं बदला है, उसने परवाह नहीं की|
जल्द ही ईटों को ले जाने के लिए मजदूर आए| एक मजदूर ने उस कच्ची ईंट को देखकर पूछा, "अरे, यह यहाँ कैसे आ गई?" उसने उसे उठाकर बाहर फेंक दिया|
अपनी सहेलियों को खुशी-खुशी जाते देख कच्ची ईंट को बहुत अफ़सोस हुआ, पर अब अफ़सोस करने का कोई फायदा न था| वह यहाँ अलग, अकेली और बेकार पड़ी रही, फिर हवा चलने और बारिश होने के बाद धीरे-धीरे उसने अपना आकार खो दिया और अंततः कीचड़ का लोंदा बन गई|
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पाप-पुण्य |
- रामयतन यादव
- साभार : संडे जागरण |
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सुबह-सुबह दरवाजे पर गंगू दलाल को खड़ा देख नन्हा सा दुलारे काँप उठा| उसने दौड़ते हुए आँगन में खड़ी अपनी माँ के पास जाकर पूछा "माँ... माँ... माँ... गंगू आज यहाँ क्यों आया है?
"अपनी गाय को खरीदने बेटा|"
माँ ने अनमने भाव से संक्षिप्त सा उत्तर दिया और दरवाजे पर आकर गंगू से मोल-भाव करने लगी| कुछ देर की हूल-हुज्जत के पश्चात जब पाँच सौ रुपये पर बात तय हो गई तो रुपये देकर गंगू गाय को साथ लेकर जाने लगा|
उसी समय दुलारे ने पुनः टोका, "माँ तूने गाय को क्यों बेच दिया?"
"अब वो बूढ़ी हो गयी थी न इसलिए...|"
दुलारे कुछ देर तक गंगू के साथ जा रही गाय को देखता रहा| फिर कहा, "मगर लोग तो कहते हैं कि गंगू गाय को कसाई के हाथों में बेच देता है... तो क्या तुम्हें पाप नहीं लगेगा?"
बेटे की बात सुनकर माँ एकबारगी काँप उठी| गंगू द्वारा दिए गये रुपयों को गिन रही उसकी उंगलियाँ शिथिल पड़ गयीं| बेटे द्वारा पाप-पुण्य की बात छेड़ देने के कारण उसके भीतर किंचित झुंझलाहट के साथ एक अजीब किस्म का डर भी पैदा हो गया|
किंतु तत्क्षण ही अपने मन को आश्वस्त करने के ख्याल से बोली, "बेटा! पाप से बचने के लिए ही तो सीधे न बेचकर दो सौ का घाटा उठा रही हूँ| नहीं तो सात सौ में न बेचती...?|"
फिर कुछ पल रुककर एक गहरी साँस खींचकर इत्मीनान से बोली, "अब इस पाप की ज़िम्मेवारी गंगू पर ही होगी... बेटा|"
दुलारे अवाक होकर काफ़ी देर तक अपनी माँ का चेहरा देखता रहा| शायद पाप-पुण्य का यह हस्तांतरण वह समझ नही सका था|
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पछतावा |
- डॉ. योगेंद्र नाथ शुक्ल, इंदौर
- साभार : पत्रिका, हमलोग |
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"ये जूते कितने के हैं?"
"साहब, आठ सौ पचास रुपये के|"
दुकानदार के भाव सुनकर धीरज बाबू ने अपने बेटे को धीरे से समझाया-
"पुनीत! मैं तुम्हे दूसरी दुकान लेकर चलता हूँ| ये जूते बहुत महँगे हैं|"
दोनो उस दुकान से बाहर निकलने लगे| अरविंद के पापा और मेरे पापा एक ही पद पर हैं| लेकिन दोनो में कितना अंतर है? उसके पापा उसकी हर मांग पूरी करते हैं| उसकी हर चीज़ कितनी अच्छी होती है| और मेरे पापा हर चीज़ को खरीदने से पहले कितना सोचते हैं| अपने मनपसंद जूतों को न खरीद पाने के कारण पुनीत मन ही मन झल्ला रहा था| उसे अपने पापा की कंजूसी पर क्रोध आ रहा था|
पापा बोले-
"मैं जो पहनता हूँ, उससे अच्छे कपड़े तुम्हें पहनाता हूँ| तुम तसल्ली रखो, मैं तुम्हे अच्छे जूते दिलवाउँगा... बेटा! ईमानदारी के पैसों को फ़िज़ूल में खर्च करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता| तुम बड़े होकर समझोगे कि ईमानदारी से और बेईमानी से कमाए हुए धन में क्या अंतर है|"
अपनी बात पूरी कर पापा ने पुनीत के सिर पर हाथ रख दिया| वह चाहकर भी अपनी निगाहें ऊपर नहीं कर पा रहा था| उसके मन में अपने और अरविंद के पापा के स्थान बदलने लगे|
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