|
Copyright © Bhopalbuzz.com |
Year
2010 |
Powered
by Effects Multimedia & Design Cell, Bhopal |
|
कविताएँ : |
|
|
भोपाल बज़्ज़ के इस पेज को अपनी कविताओं का मंच बनायें| अपनी कविताएँ हिन्दी में टाइप कर फ़ॉन्ट के साथ हमें emdc.bhopal@gmail.com पर ई-मेल कर दें| साथ में अपना ई-मेल भी ज़रूर भेजें| ध्यान रखें, आपकी कविताएँ हमारी एडिटोरियल टीम की सहमति के बाद ही प्रकाशित हो सकेंगें| इस वास्ते कोई पत्राचार मान्य नही होगा|
|
| |
|
|
ग़ज़ल |
|
| |
आचार्य उषा भदौरिया, भोपाल |
|
|
खुश्बू से कुछ फूल खिलाना सिखला दो,
अश्कों से ही दीप जलाना सिखला दो|
दुनिया तो अंजान पुरानी लगती है,
अब आँखों में ख्वाब बसाना सिखला दो||
सारे दरिया प्यास लबों पे रखते हैं,
ख्वाहिश को अरमान सजाना सिखला दो|
ग़ज़लों ने ही भेद जिया के खोलें हैं,
लफ़्ज़ों को हर राज़ छुपाना सिखला दो||
खुशियाँ झूठी, अक्स पराए लगते हैं,
वादों को तुम प्रीत निभाना सिखला दो|
नादिया की तकदीर, हथेली सागर की,
पानी पर तस्वीर बनाना सिखला दो||
तुमसे इक उम्मीद सजाई थी मैने,
आईने में अक्स दिखाना सिखला दो|
दुनिया जीती, हार गई "उषा" शायद,
सपनों से तुम आँख चुराना सिखला दो||
|
| |
|
|
|
|
दाता तेरा शुक्रिया |
|
|
मैं सोचता जा रहा था,
दिल में लिए यही शिकवे,
दाता तूने मुझे क्या दिया...
क्या दिया... क्या दिया...
इतने में पीछे से मुझे,
एक करुण कंठ ने,
कंपकपाँते हुए आवाज़ दी...
बाबा... बाबा... बेटा... बेटा...
एक रुपया आठ आना,
मैने उसको मुड़कर देखा,
हाथ नही थे उसके,
मुँह से ऐसा लगता था,
जैसे हो चार दिन का फाका...
फिर मैने अपने को देखा,
और धर्म-स्थल की सीढ़ियों को देखा,
जिस पर मासूम बच्चे, बेबस और लाचार,
कह रहे थे हर आते-जाते से,
बाबा... बाबा... बेटा... बेटा...
एक रुपया आठ आना,
कोई देख सकता है, तो चल नहीं सकता,
कोई चल सकता है, तो देख नहीं सकता,
फिर देखा मैने अपनी काठी को,
और देखा अपने सिर पे साया,
अब मैं मुस्कुराते हुए सोचता जा रहा हूँ,
दाता तेरा शुक्रिया... दाता तेरा शुक्रिया...
शुक्रिया... शुक्रिया...
|
| |
|
|
|
|
Site
best viewed in 1024 x 768, IE 5.0+ All
Rights Reserved |
|